एक बार फिर मौसम झाड़ूओ का आ गया है। टमाटर , प्याज की तरह इसके भी रेट आसमान को छूने लगे है। जो झाड़ू हमारे बचपन मे २५ पैसा का या ३० पैसा का होता था जो कोई नही पू छता था। आज वह १२५ रुपऐ से ५००रुपऐ का मिल रहा है। एक जमाना था जब लोग झाड़ू को ऐसी जगह रखते थे जहां किसी की नज़र भूले से भी उस पर न पड़े। किसी दरवाजे के पीछा ,पालग के नीचे या स्टोर मे जिनमे दुनिया भर का रदी माल जमा रहता है। बस उसकी औकात वही रहने की थी । लेकिन अब तो झाड़ू के दिन फिर गए है अब तो लोग झाड़ू को छुपाकर नही रखते है। बल्कि सजाकर रखते है। जैसे वह कोई ट्रॉफी या मेडल हो। अब चनाव चिह्न झाड़ू बन चुका है। यही झाड़ू आज भारत की राजधानी मे राज कर रहा है गांधी जयंती के बाद यहाँ राष्ट्रीय सम्मान का प्रतीक बन गया है। कई महानुभावो ने इसे अपनी कार के आगे पार्टी के झड़े की तरह लहरा डाला और गाने लगे झीगा लाल। जिसकी लाठी उसकी भैस वाला मुहावरा ही बदल डाला । जिसका झाड़ू उसकी सत्ता। सत्ता का प्रतीक बन गया है। यह नाचीज जो घर का एक कोने मे पड़ा रहता था। इसे खड़ा रहने की भी इज़ाजत नही थी जितनी बड़ी झाड़ू उतनी बड़ी राजनीति। दिल्ली मे मत -दाता द्वारा "आप " सरकार ने भरी बहुमत से जीती है। अरविन्द केजरीवाल का एजेंडा उनकी नज़रो मे जबरदस्त प्रभाव बनाए हुऐ है स्थानीय मुद्दो को लगाता उठाने मे कामयाब रही ''आम आदमी पार्टी'' सचमुच बंधाई की पात्र है। विगत एक वर्ष से प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया मे कामयाब रही आम आदमी पार्टी की झाड़ू की आंधी। झाड़ू ने बड़ी -बड़ी पार्टी की हवा ही निेकाल दी अरविन्द केजरीवाल के आने से दिल्ली के प्रशासन विभाग मे भ्रस्टाचारयो की उलटी गिनती शुरु वात हो चुकी है। अब झाड़ू से जगह - जगह फैला कचरा ,भ्रस्टाचार या मन की मैल को ख़तम कर रहा है। Monday, 13 April 2015
एक बार फिर मौसम झाड़ूओ का आ गया है। टमाटर , प्याज की तरह इसके भी रेट आसमान को छूने लगे है। जो झाड़ू हमारे बचपन मे २५ पैसा का या ३० पैसा का होता था जो कोई नही पू छता था। आज वह १२५ रुपऐ से ५००रुपऐ का मिल रहा है। एक जमाना था जब लोग झाड़ू को ऐसी जगह रखते थे जहां किसी की नज़र भूले से भी उस पर न पड़े। किसी दरवाजे के पीछा ,पालग के नीचे या स्टोर मे जिनमे दुनिया भर का रदी माल जमा रहता है। बस उसकी औकात वही रहने की थी । लेकिन अब तो झाड़ू के दिन फिर गए है अब तो लोग झाड़ू को छुपाकर नही रखते है। बल्कि सजाकर रखते है। जैसे वह कोई ट्रॉफी या मेडल हो। अब चनाव चिह्न झाड़ू बन चुका है। यही झाड़ू आज भारत की राजधानी मे राज कर रहा है गांधी जयंती के बाद यहाँ राष्ट्रीय सम्मान का प्रतीक बन गया है। कई महानुभावो ने इसे अपनी कार के आगे पार्टी के झड़े की तरह लहरा डाला और गाने लगे झीगा लाल। जिसकी लाठी उसकी भैस वाला मुहावरा ही बदल डाला । जिसका झाड़ू उसकी सत्ता। सत्ता का प्रतीक बन गया है। यह नाचीज जो घर का एक कोने मे पड़ा रहता था। इसे खड़ा रहने की भी इज़ाजत नही थी जितनी बड़ी झाड़ू उतनी बड़ी राजनीति। दिल्ली मे मत -दाता द्वारा "आप " सरकार ने भरी बहुमत से जीती है। अरविन्द केजरीवाल का एजेंडा उनकी नज़रो मे जबरदस्त प्रभाव बनाए हुऐ है स्थानीय मुद्दो को लगाता उठाने मे कामयाब रही ''आम आदमी पार्टी'' सचमुच बंधाई की पात्र है। विगत एक वर्ष से प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया मे कामयाब रही आम आदमी पार्टी की झाड़ू की आंधी। झाड़ू ने बड़ी -बड़ी पार्टी की हवा ही निेकाल दी अरविन्द केजरीवाल के आने से दिल्ली के प्रशासन विभाग मे भ्रस्टाचारयो की उलटी गिनती शुरु वात हो चुकी है। अब झाड़ू से जगह - जगह फैला कचरा ,भ्रस्टाचार या मन की मैल को ख़तम कर रहा है।
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